अखिल भारतीय संत शिरोंमणि सतगुरु रविदास मिशन

ईश्वर के द्वारा उनकी महानता की जाँच की गयी थी

वो अपने समय के महान संत थे और एक आम व्यक्ति की तरह जीवन को जीने की वरीयता देते है। कई बड़े राजा-रानियों और दूसरे समृद्ध लोग उनके बड़े अनुयायी थे लेकिन वो किसी से भी किसी प्रकार का धन या उपहार नहीं स्वीकारते थे। एक दिन भगवान के द्वारा उनके अंदर एक आम इंसान के लालच को परखा गया, एक दर्शनशास्त्री गुरु रविदास जी के पास एक पत्थर ले कर आये और उसके बारे में आश्चर्यजनक बात बतायी कि ये किसी भी लोहे को सोने में बदल सकता सकता है। उस दर्शनशास्त्री ने गुरु रविदास को उस पत्थर को लेने के लिये दबाव दिया और साधारण झोपड़े की जगह बड़ी-बड़ी इमारतें बनाने को कहा। लेकिन उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया।

उस दर्शनशास्त्री ने फिर से उस पत्थर को रखने के लिये गुरुजी पर दबाव डाला और कहा कि मैं इसे लौटते वक्त वापस ले लूँगा साथ ही इसको अपनी झोपड़ी के किसी खास जगह पर रखने को कहा। गुरु जी ने उसकी ये बात मान ली। वो दर्शनशास्त्री कई वर्षों बाद लौटा तो पाया कि वो पत्थर उसी तरह रखा हुआ है। गुरुजी के इस अटलता और धन के प्रति इस विकर्षणता से वो बहुत खुश हुए। उन्होंने वो कीमती पत्थर लिया और वहाँ से गायब हो गये। गुरु रविदास ने हमेशा अपने अनुयायीयों को सिखाया कि कभी धन के लिये लालची मत बनो, धन कभी स्थायी नहीं होता, इसके बजाय आजीविका के लिये कड़ी मेहनत करो।

एक बार जब उनको और दूसरे दलितों को पूजा करने के जुर्म में काशी नरेश के द्वारा उनके दरबार में कुछ ब्राह्मणों की शिकायत पर बुलाया गया था, तो ये ही वो व्यक्ति थे जिन्होंने सभी गैरजरुरी धार्मिक संस्कारों को हटाने के द्वारा पूजा की प्रकिया को आसान बना दिया। संत रविदास को राजा के दरबार में प्रस्तुत किया गया जहाँ गुरुजी और पंडित पुजारी से फैसले वाले दिन अपने-अपने इष्ट देव की मूर्ति को गंगा नदी के घाट पर लाने को कहा गया।

राजा ने ये घोषणा की कि अगर किसी एक की मूर्ति नदी में तैरेगी तो वो सच्चा पुजारी होगा अन्यथा झूठा होगा। दोनों गंगा नदी के किनारे घाट पर पहुँचे और राजा की घोषणा के अनुसार कार्य करने लगे। ब्राह्मण ने हल्के भार वाली सूती कपड़े में लपेटी हुयी भगवान की मूर्ति लायी थी वहीं संत रविदास ने 40 कि.ग्रा की चाकोर आकार की मूर्ती ले आयी थी। राजा के समक्ष गंगा नदी के राजघाट पर इस कार्यक्रम को देखने के लिये बहुत बड़ी भीड़ उमड़ी थी।

पहला मौका ब्राह्मण पुजारी को दिया गया, पुजारी जी ने ढ़ेर सारे मंत्र-उच्चारण के साथ मूर्ती को गंगा जी ने प्रवाहित किया लेकिन वो गहरे पानी में डूब गयी। उसी तरह दूसरा मौका संत रविदास का आया, गुरु जी ने मूर्ती को अपने कंधों पर लिया और शिष्टता के साथ उसे पानी में रख दिया जो कि पानी की सतह पर तैरने लगा। इस प्रकिया के खत्म होने के बाद ये फैसला हुआ कि ब्राह्मण झूठा पुजारी था और गुरु रविदास सच्चे भक्त थे।

दलितों को पूजा के लिये मिले अधिकार से खुश होकर सभी लोग उनके पाँव को स्पर्श करने लगे। तब से, काशी नरेश और दूसरे लोग जो कि गुरु जी के खिलाफ थे, अब उनका सम्मान और अनुसरण करने लगे। उस खास खुशी के और विजयी पल को दरबार की दिवारों पर भविष्य के लिये सुनहरे अक्षरों से लिख दिया गया।

सिक्ख धर्म के लिये गुरु जी का योगदान

सिक्ख धर्मग्रंथ में उनके पद, भक्ति गीत, और दूसरे लेखन (41 पद) आदि दिये गये थे, गुरु ग्रंथ साहिब जो कि पाँचवें सिक्ख गुरु अर्जन देव द्वारा संकलित की गयी। सामान्यत: रविदास जी के अध्यापन के अनुयायी को रविदासीया कहा जाता है और रविदासीया के समूह को अध्यापन को रविदासीया पंथ कहा जाता है।

गुरु ग्रंथ साहिब में उनके द्वारा लिखा गया 41 पवित्र लेख है जो इस प्रकार है; “रागा-सिरी(1), गौरी(5), असा(6), गुजारी(1), सोरथ(7), धनसरी(3), जैतसारी(1), सुही(3), बिलावल(2), गौंड(2), रामकली(1), मारु(2), केदारा(1), भाईरऊ(1), बसंत(1), और मलहार(3)”।

  1. उनके पिता के मौत के समय की घटना

रविदास की पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने अपने पड़ोसियों से विनती की कि वो गंगा नदी के किनारे अंतिम रिवाज़ में मदद करें। हालाँकि ब्राह्मण रिती के संदर्भ में खिलाफ थे कि वो गंगा के जल से स्नान करेंगे जो रस्म की जगह से मुख्य शहर की ओर जाता है और वो प्रदूषित हो जायेगा। गुरु जी बहुत दुखी और मजबूर हो गये हालाँकि उन्होंने कभी भी अपना धैर्य नहीं खोया और अपने पिता की आत्मा की शांति के लिये प्रार्थना करने लगे। अचानक से वातावरण में एक भयानक तूफान आया और नदी का पानी उल्टी दिशा में बहना प्रारंभ हो गया और जल की एक गहरी तरंग आयी और लाश को अपने साथ ले गयी। इस भवंडर ने आसपास की सभी चीजों को सोख लिया। तब से, गंगा का पानी उल्टी दिशा में बह रहा है।

  • Ravidas ji Ki Sampurna Kthah Krane ke liye samprk kre

Sat Guru

सिक्ख धर्म के लिये गुरु जी का योगदान

सिक्ख धर्मग्रंथ में उनके पद, भक्ति गीत, और दूसरे लेखन (41 पद) आदि दिये गये थे, गुरु ग्रंथ साहिब जो कि पाँचवें सिक्ख गुरु अर्जन देव द्वारा संकलित की गयी। सामान्यत: रविदास जी के अध्यापन के अनुयायी को रविदासीया कहा जाता है और रविदासीया के समूह को अध्यापन को रविदासीया पंथ कहा जाता है।

गुरु ग्रंथ साहिब में उनके द्वारा लिखा गया 41 पवित्र लेख है जो इस प्रकार है; “रागा-सिरी(1), गौरी(5), असा(6), गुजारी(1), सोरथ(7), धनसरी(3), जैतसारी(1), सुही(3), बिलावल(2), गौंड(2), रामकली(1), मारु(2), केदारा(1), भाईरऊ(1), बसंत(1), और मलहार(3)”

ravidas ji

करुणा सिन्धु आधार हो तुम रविदास हरे रविदास हरे

गुरु कर दो नैया पार मेरी रविदास हरे रविदास हरे  

                         जब छूत का भुत भगाया था विप्रो ने तुम्हे सताया था

                         तुमनेअभिमान  मिटाया था रविदास हरे रविदास हरे

गंगा पर परभीपड़ी  भारी  जहां पहुंचे थे नर नारी

गंगा पर शिला पार उतरी थी रविदास हरे रविदास हरे

                  सिकंदर ने जुल्म कमाया था तुम्हे कारागार पहुंचाया था

                तुमने स्वंय परकाश  दिखाया था रविदास हरे रविदास हरे

चेली भई मीरा कमाली  थी योग वती उमर की बालीथी

तुमने दी अमृत की प्याली थी रविदास हरे रविदास हरे

             तुमने सबका कस्ट निवारा था देखो दुखी ये वंस हमारा था

            तुम्हारे सिवा ना कोई उभरन हारा था रविदास हरे रविदास हरे

अब वार हमारा आया हे दासो को क्यों तडफाया हे

अब समनदास मन भय हे रविदास हरे रविदास हरे


आज बसंत संत मिल बैठे पहली आरती गावेंगे

आज बसंत संत मिल बैठे पहली आरती गावेंगे
परमानन्द गुरु खोल दुवारा सतगुरु दर्शन पावेंगे
ज्ञान विवेक की करू में आरती ऐसा थाल सजावेंगे
डोरा धुप कपूर मंगावे चित चन्दन का तिलक लगावें
ज्ञान अगम दरसावेंगे |
सब देवो में सतगुरु देवा सबसे अच्छी गुरु जी सेवा
सेवा नाम पदार्थ अमृत रुच रुच भोग लगावेंगे
अपने आप धरे गुरु आगे सतगरु बैठे हे बड़े भाग्ये
धन धन चरण गुरु जी लगे भव सागर तर जावेंगे
परमान्द ने अमृत दिना रविदास ने हरि रश पिना
राहु हरिनन्द युग युग जीवे लख लख शुक्र मनावेंगे
आज बसंत संत मिल बैठे पहली आरती गावेंगे
परमानन्द गुरु खोल दुवारा सतगुरु दर्शन पावेंगे


सतगुरु दया करो महराज रविदास कहा ने वाले

                     ये सागर नदिया गहरी सब दुब रहा संसारी

                     सतगुरु पार लगाने वाले रविदास कहाने वाले

सदना को तुमने उभारा मीरा को पार उतारा

जीवो को मोक्ष कराने वाले रविदास कहाने वाले

                     सतगुरु दया करो महराज रविदास कहा ने वाले

                     विप्रो ने मता उपाया सब झूट का भुत बताया

सतगुरु भरम मिटने वाले रविदास कहाने वाले

सतगुरु दया करो महराज रविदास कहा ने वाले

                     स्वामी गंगा ताट पर आये सब नर नारी धाये

                      चल पर शिला तिरने वाले रविदास कहाने वाले

सतगुरु दया करो महराज रविदास कहा ने वाले

दादा ज्ञान भिक्षुक दास तुम्हारे तुमने लाखो को पार उतरे

           गुरु समनदास जी को ज्ञान करने वाले रविदास काहने वाले

                     सतगुरु दया करो महराज रविदास कहा ने वाले   


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